August 31, 2026

रांची। आइएएस अधिकारी सह सिमडेगा उपायुक्त कंचन सिंह ने लोक आस्था के महापर्व छठ को पूरे विधिवत तरीके से मनाया। उन्होंने इस छठ महापर्व पर कहा कि भारत की उदात्त संस्कृति का एक अद्भुत उदाहरण है छठ जिसमें व्यक्तिगत साधना सामूहिक लोककल्याण के भाव में रूपांतरित होती है। मेरी दृष्टि में यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मनुष्य, प्रकृति और समाज के बीच गहरी एकात्मकता का भी प्रतीक है। आत्मसंयम, श्रद्धा और साधना के उच्चतम आदर्श को दर्शाते इस व्रत की शुरुआत व्यष्टि अर्थात् व्यक्तिगत स्तर से होती है। तीन दिनों के उपवास के पश्चात निर्मल हुई काया वाचा से चराचर जगत को जीवनी शक्ति प्रदान करने वाले सूर्य को जीवन का सृजन करने वाले जल का अर्घ्य
देना भी संभवतः उसी एकात्म और उसके प्रति आभार का प्रकटीकरण है।
यह व्यक्ति के भीतर शुद्धता, धैर्य और तपस्या का विकास करता है और जब असंख्य लोग एक साथ नदी, तालाब या अन्य जलस्रोतों पर पर एक ही भावना से एकत्र होते हैं,तो यह पर्व व्यष्टि से समष्टि में रूपांतरित हो जाता है ; घर का दीप पूरे समाज की ज्योति में मिल जाता है।
जाति, वर्ग और अन्य भेदों के समाहार का यही भाव इसे “समष्टि का उत्सव” बनाता है।
यह लोक का पर्व है, इसमें कोई मंत्र नहीं पुरोहित नहीं । लोक जीवन से निकले लोकभाषा के गीत ही स्तुति का एकमात्र साधन हैं और उन गीतों से भी वही एकात्म गुंजित होता है । इन गीतों में जब व्रती समाज की विभिन्न जातियों से व्रत के लिए आवश्यक उपादान जैसे सूप, फूल, पान , दूध आदि जुटाने का आग्रह करती है, या अर्घ्य के लिए घाटों की सफाई करने, उन्हें सजाने का आग्रह करती है अथवा सूर्यदेव से सबके लिए निरोगी काया , सुख सम्पत्ति की गुहार लगाती है तो वह अनजाने ही व्यष्टि की सीमा पार कर जाती है ।
यहाँ वेदना भी सामूहिक है । इन गीतों के माध्यम से इसकी हर व्रती एक स्वर से दुनिया की हर निःसंतान स्त्री के लिए, हर रोगी के लिये, हर निःशक्त के लिए , हर निर्धन के लिए सूर्य देव और छठी मैया से प्रार्थना करती मिलेगी। यह समष्टि स्तर पर सामूहिकता , परस्पर सहयोग और लोकसंघटन का प्रभावी संदेश है। हर व्यक्ति, चाहे वह व्रती हो या दर्शक, छठ में उसकी उपादेयता है, उपस्थिति है । जहाँ वह कुछ सहयोग नहीं भी कर रहा वहाँ भी वह “बाट के बटोही “के रूप में सामूहिक प्रयोजन में सहभागी बन कर उपस्थित है- “पूछेला बाट के बटोहिया, बहंगी केकरा के जाय “।
इस उदात्तता के संवाहक होने के कारण ही छठ व्रती के प्रति भी लोक में श्रद्धा भाव रहता है ।
मेरा अपना अनुभव है कि जल में सूर्याभिमुख खड़ा व्रती – पंच के भला; ता पाछा हमरो भला – के अतिरिक्त कुछ और माँग नहीं पाता, सोच भी नहीं पाता ।
यह इस सत्य का भी प्रतीक है कि जब व्यक्ति अपनी साधना को जीवमात्र के कल्याण से जोड़ देता है तो ही वह समाज के लिए श्रद्धा का पात्र हो जाता है । व्यष्टि से समष्टि तक —यह यात्रा आत्मशुद्धि से समाजशुद्धि की यात्रा है। छठ केवल व्रत नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के द्वंद्व के समाहार और सांस्कृतिक एकात्मकता की सामूहिक चेतना की परंपरा बचाए रखने के संकल्प को साल दर साल दोहराते रहने का अनुष्ठान है।
सिमडेगा उपायुक्त कंचन सिंह के अपने विचार छठ महापर्व पर उनके फेसबुक वाल से

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